Rahul vs Smriti

तो अंततः राहुल गाँधी बनाम स्मृति ईरानी होते-होते रह गया। राहुल अब वायनाड के साथ-साथ रायबरेली से चुनाव लड़ रहे हैं। स्मृति ईरानी अब तक राहुल के खिलाफ बोल-बोलकर अपनी राजनीति चमकाती रही थीं। उनकी कीर्ति विभिन्न मंत्रालय में उनके कामों को लेकर नहीं, बल्कि राहुल गाँधी को अमेठी में हराने को लेकर है। अब जब राहुल उनके सामने चुनाव मैदान में नहीं हैं तो उनकी राहुल-मर्दनी वाली छवि ही मुरझा गई है। सच तो यह भी है कि अब स्वयं उनका मान-सम्मान दांव पर है। अगर कहीं जो वह किशोरी लाल शर्मा से चुनाव हार गईं तब उन्हें किसी मंत्रालय की बागडोर थमाना तो दूर, कोई उन्हें राज्यसभा में भी नहीं भेजेगा। वैसे भी हम देखते रहे हैं कि जैसे-जैसे राहुल को लेकर उनकी उपयोगिता कम होती गई है, उनके मंत्रालय बदलते गए हैं। ऐसे में उनके पास सिर्फ खोने के लिए ही है, पाने के लिए कुछ नहीं।

बहरहाल, कहना गलत न होगा कि अब से पहले तक कांग्रेस फ्रंट फुट पर दिखाई दे रही थी पर अमेठी से न लड़कर रायबरेली से लड़ने के फैसले से वह बैक फुट पर आ गई है। मछली, मुगल, मंगलसूत्र करने के बावजूद अब तक भाजपा के साथ कुछ भी अच्छा होता नहीं दीख पड़ता था। उसने ‘वार रुकवा दी पापा’ जैसा विज्ञापन देकर अपनी भद पिटवा दी। कर्नाटक में उसने जदएस के साथ मेल किया तो प्रज्वल रेवन्ना की वजह से उसे शर्मसार होना पड़ा। दिल्ली में कांग्रेस के दफ्तर पर विद्यार्थियों की परेड कराना खुद उसके लिए और उसका साथ दे रहे शिक्षण संस्थान के लिए महंगा साबित हुआ और मोदी काल के शैक्षिक स्तर की कलई खुल गई। ऐसे में राहुल वायनाड, अमेठी या रायबरेली में से किसी एक सीट पर लड़ते तो यह उनका हक था पर दो सीटों पर लड़ने के बावजूद वह अमेठी से नहीं लड़ रहे हैं, यह बात सीधे-सीधे उनके खिलाफ जाती है। वैसे हो सकता है कि कांग्रेस ने राहुल बनाम स्मृति के खेल का अंत करने के लिए ही ऐसा फैसला किया हो।

फिर भी, चुनाव का ऐलान होने के पहले ही राहुल को पता था कि उनकी माँ और रायबरेली की निवर्तमान सांसद श्रीमती सोनिया गाँधी वहां से चुनाव नहीं लड़ेंगी। ऐसे में इस सीट पर चुनाव लड़ने के लिए उन्हें आखिरी समय तक इंतजार करने की जरूरत नहीं थी। इस बार वायनाड की बयाज रायबरेली से चुनाव लड़ने का उनका फैसला हर तरह से तर्कसंगत होता पर वायनाड के साथ-साथ रायबरेली में चुनाव लड़ने से वह कुछ भी सिद्ध करने में नाकाम रहेंगे।

अव्वल तो उनके लिए दो सीटों पर चुनाव लड़ना ही जरूरी नहीं था। वह सिर्फ वायनाड से लड़ते तो कहा जा सकता था कि वह वर्तमान सांसद हैं तो वहां से क्यों न लड़ें। यदि वायनाड से नहीं लड़कर वह रायबरेली से ही लड़ते तब भी कहा जा सकता था कि अपने परिवार की परम्परागत सीट को वह खाली क्यों जाने दें। अगर दो सीटों पर लड़ना ही था तो वह वायनाड और अमेठी होने चाहिए थे। वायनाड के साथ-साथ अमेठी से चुनाव लड़ने से उनकी छवि योद्धा की बनती और कहा जा सकता था कि वायनाड में अपनी सुनिश्चित जीत के बावजूद वह अमेठी में अपने खोए सम्मान के लिए लड़ रहे हैं।

दोनों सीटों पर विजय पाने के बाद उन्हें एक सीट तो छोडनी ही होगी। ऐसे में उनके पास न तो वायनाड की सीट छोड़ने का कोई तर्क होगा और न रायबरेली की सीट छोड़ने का। अमेठी से लड़ने पर हद से हद वह चुनाव फिर हार जाते। तब भी रायबरेली का रास्ता तो उनके लिए आगे भी खुला रहता पर अब कहीं जो वह रायबरेली से चुनाव हार गए तो न केवल अपने लिए, बल्कि अपने परिवार के अन्य सदस्यों के लिए भी वह अमेठी के साथ रायबरेली का विकल्प भी गंवा देंगे। और जो भाजपा उन्हें धूल चटाने पर आमादा है, वह उन्हें रायबरेली में आसानी से छोड़ देगी, ऐसा नहीं हो सकता।

यह सही है कि अमेठी में उनका संघर्ष हलका नहीं था पर वहां पाने के लिए ही था, खोने के लिए नहीं। यह सही है कि भाजपा चाहती थी कि वह उन्हें अमेठी में एक बार फिर घेरे पर ऐसे में उसके सामने भी उतनी ही बड़ी चुनौती थी, जितनी कि राहुल के सामने। बल्कि शायद ज्यादा बड़ी क्योंकि राहुल तो वहां से हारे हुए ही थे, दुबारा उन्हें वहां से हरा कर भी उसे कुछ नया नहीं मिलने वाला था। पर अगर जो राहुल वहां से जीत जाते तब भाजपा की तो सारी हेठी ही निकल जाती।

अमेठी में माना जा रहा था कि स्मृति ईरानी को राहुल ही हरा सकते हैं। यह भी कहा जा रहा था कि प्रियंका भी खड़ी हों तो टक्कर बड़ी होगी। ऐसे में राहुल अब की तरह रायबरेली से खड़े होते और प्रियंका गाँधी वाड्रा अमेठी से खड़ी होतीं तो भी वे दोनों भाजपा के लिए भारी मुश्किल खड़ी कर देते। भाजपा वंशवाद का हवाला जरूर देती पर वह उतना टिकता नहीं क्योंकि लोग देख रहे हैं कि वंशवाद से खुद भाजपा को भी परहेज नहीं है। वैसे भी भाजपा को इस बात की जरा भी परवाह नहीं रहती कि उसके बारे में कौन, क्या बोल रहा है। उसके सामने जीत का ही लक्ष्य रहता है चाहे इसके लिए उसे कुछ भी करना पड़े। पर गाँधी परिवार के लिए यह जरा मुश्किल है और इसीलिए शायद वह राहुल और प्रियंका को एक साथ खड़ा करने से परहेज कर बैठी।

वैसे उलाहना तो उसे तब भी मिलेगी और मिल भी रही है। वंशवाद को लेकर नहीं तो अमेठी से भागने को लेकर ही सही। कहने वाले तो कहेंगे ही पर राहुल ने भारत की दो बड़ी यात्राएं कर के संघर्ष का जो बूता दिखाया था, उनके इस निर्णय से उसमें फिलहाल के लिए सेंध लग गई है।

हालांकि यह देखना दिलचस्प होगा कि राहुल बनाम स्मृति का यह खेल अब कैसे आगे बढ़ेगा?

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